स्वास्थ्य – Janta Express 24×7 https://jantaexpress24x7.com National News Portal Thu, 05 Mar 2026 09:59:42 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://jantaexpress24x7.com/wp-content/uploads/2025/08/cropped-Janta-Express-24x7-Logo-32x32.png स्वास्थ्य – Janta Express 24×7 https://jantaexpress24x7.com 32 32 बुजुर्गों ही नहीं, युवाओं और बच्चों में भी बढ़ रही सुनने की समस्या, जानिए इसके कारण https://jantaexpress24x7.com/2026/03/05/hearing-problems-are-increasing-not-only-in-the-elderly-but-also-in-the-youth-and-children-know-the-reasons-behind-it/ Thu, 05 Mar 2026 09:59:42 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6931

आमतौर पर यह माना जाता है कि सुनने की क्षमता उम्र बढ़ने के साथ कम होती है, लेकिन अब यह समस्या केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई है। हाल के वर्षों में युवाओं और बच्चों में भी कम सुनाई देने और बहरेपन के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार तेज आवाज में लंबे समय तक संगीत सुनना, कानों में संक्रमण, चोट, अधिक वैक्स जमा होना और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव भी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या स्थायी बहरेपन में भी बदल सकती है।

बहरेपन के पीछे क्या हैं कारण

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि सुनने की क्षमता कम होने के कई कारण हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ कान के अंदर मौजूद संवेदनशील हिस्सों में धीरे-धीरे क्षति होने लगती है और रक्त संचार भी कम हो जाता है, जिससे सुनने में दिक्कत आती है। इसके अलावा तेज आवाज, जैसे डीजे या धमाके जैसी ध्वनियां कान के भीतर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कान में संक्रमण, खसरा जैसी बीमारियां और कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी सुनने की समस्या के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

समय पर इलाज न होने पर बढ़ सकती है परेशानी

स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग सुनने की क्षमता में कमी से जूझ रहे हैं। यदि कान की सामान्य समस्या का समय पर इलाज न कराया जाए तो यह स्थायी बहरेपन का कारण बन सकती है। कम सुनाई देने का असर केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। लंबे समय तक इस समस्या से जूझ रहे लोगों में अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएं भी देखी गई हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार 85 डेसिबल से अधिक तेज आवाज में रहने से कान के अंदरूनी हिस्से को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां भी सुनने की क्षमता कम होने के जोखिम को बढ़ाती हैं।

क्या बहरेपन का इलाज संभव है?

डॉक्टरों का कहना है कि हर प्रकार का बहरापन स्थायी नहीं होता। यदि सुनने की समस्या कान में मैल जमा होने या संक्रमण की वजह से है तो सही इलाज और दवाओं से सुनने की क्षमता वापस आ सकती है। हालांकि यदि कान के अंदर की संवेदनशील कोशिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, तो इसे पूरी तरह ठीक करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मामलों में हियरिंग एड जैसे उपकरण मरीजों की मदद करते हैं।

नवजात शिशुओं में यदि सुनने की समस्या का समय रहते पता चल जाए तो कुछ मामलों में उपचार के जरिए स्थिति में सुधार संभव होता है।

जीन थेरेपी से नई उम्मीद

हाल के वर्षों में वैज्ञानिक शोधों ने बहरेपन के इलाज की दिशा में नई उम्मीदें भी जगाई हैं। वर्ष 2025 में स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में जीन थेरेपी के जरिए जन्मजात बहरेपन के इलाज की संभावना सामने आई। अध्ययन में शामिल कुछ मरीजों में एक विशेष इंजेक्शन के बाद सुनने की क्षमता में सुधार देखा गया। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को व्यापक रूप से अपनाने से पहले अभी और बड़े स्तर पर परीक्षण की जरूरत है।

नोट: यह जानकारी विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार की गई है।

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कॉन्टैक्ट लेंस लगाकर होली खेलना पड़ सकता है भारी, जान लीजिये इसके नुकसान https://jantaexpress24x7.com/2026/03/02/playing-holi-with-contact-lenses-can-be-costly-know-the-disadvantages/ Mon, 02 Mar 2026 10:16:02 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6893

होली के रंगों के साथ मस्ती करना हर किसी को पसंद होता है, लेकिन इस उत्साह में अक्सर लोग अपनी आंखों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर देते हैं। खासतौर पर कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वाले लोगों के लिए यह लापरवाही गंभीर समस्या बन सकती है, क्योंकि केमिकल युक्त रंग आंखों को गहरा नुकसान पहुंचा सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कॉन्टैक्ट लेंस लगाकर होली खेलना सुरक्षित नहीं माना जाता। बाजार में मिलने वाले कई रंगों में हानिकारक रसायन, भारी धातुएं और बारीक कण मौजूद होते हैं। जब ये रंग लेंस के संपर्क में आते हैं, तो लेंस उन्हें सोख लेते हैं और ये रसायन लंबे समय तक आंखों के संपर्क में बने रहते हैं, जिससे कॉर्निया को नुकसान पहुंच सकता है।

डॉक्टरों के मुताबिक होली खेलते समय लेंस की बजाय चश्मा पहनना ज्यादा सुरक्षित विकल्प है। चश्मा आंखों को बाहरी कणों और रंगों से बचाने में मदद करता है। अगर कोई व्यक्ति लेंस पहनकर रंगों के संपर्क में आता है, तो आंखों में जलन, संक्रमण और गंभीर स्थिति में कॉर्नियल अल्सर जैसी समस्या भी हो सकती है।

दरअसल, कॉन्टैक्ट लेंस की सतह छिद्रयुक्त होती है, जो रंगों में मौजूद केमिकल को अपने अंदर समाहित कर लेती है। इससे आंखों में जलन, लालिमा और केमिकल बर्न का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, लेंस की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे देखने में धुंधलापन आ सकता है।

यदि रंग लेंस और आंख के बीच फंस जाए, तो यह कॉर्निया पर रगड़ पैदा करता है, जिससे उसकी ऊपरी परत को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा, इस स्थिति में बैक्टीरिया पनपने का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे संक्रमण और पस बनने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।

अगर गलती से आंख में रंग चला जाए, तो तुरंत लेंस को निकालकर आंखों को साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। कम से कम 10 से 15 मिनट तक आंखों को धोना जरूरी है और इस दौरान आंखों को रगड़ने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे स्थिति और खराब हो सकती है।

यदि आंखों में लालिमा, जलन, पानी आना या धुंधलापन महसूस हो, तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। घरेलू उपायों से बचना बेहतर होता है, क्योंकि गलत तरीके स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आंखों की चोट के बाद शुरुआती कुछ घंटे इलाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

(यह जानकारी सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई है, किसी भी समस्या की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।)

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क्या मालिश करने से बच्चा ज्यादा मजबूत, हेल्दी और तेजी से विकसित होता है? जानिए डॉक्टर की राय https://jantaexpress24x7.com/2026/02/28/does-massage-make-your-baby-stronger-healthier-and-faster-to-develop-learn-what-your-doctor-thinks/ Sat, 28 Feb 2026 07:28:49 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6860

नवजात शिशुओं की मालिश को लेकर हमारे समाज में कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। अक्सर यह माना जाता है कि नियमित मालिश से बच्चा ज्यादा मजबूत, हेल्दी और तेजी से विकसित होता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन धारणाओं में पूरी सच्चाई नहीं है। प्रसिद्ध शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. माधवी भारद्वाज ने हाल ही में इस विषय पर जागरूकता बढ़ाते हुए बताया कि मालिश के फायदे अलग हैं और उससे जुड़ी कई मान्यताएं गलतफहमी पर आधारित हैं।

डॉ. माधवी के अनुसार, बच्चे की मालिश का असली उद्देश्य उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाना, आंखों के संपर्क के जरिए संवाद बनाना और त्वचा को पोषण देना होता है। कई बार लोग बहुत तेज या ज्यादा दबाव के साथ मालिश करते हैं, जिससे बच्चे को नुकसान भी हो सकता है। इसलिए हल्के हाथों से और सही तरीके से मालिश करना जरूरी है।

विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि मालिश का बच्चे की हड्डियों की मजबूती या मांसपेशियों के विकास पर सीधा असर नहीं पड़ता। यानी यह सोच गलत है कि मालिश न करने से बच्चा कमजोर रह जाएगा।

क्या मालिश से सिर का आकार बदल सकता है?
डॉक्टरों के मुताबिक, बच्चे के सिर का आकार मालिश या विशेष तकिए से नहीं बदलता। इसके लिए बच्चे की पोजिशन समय-समय पर बदलना ज्यादा प्रभावी होता है। सिर पर दबाव डालना सुरक्षित नहीं होता।

क्या मालिश से बच्चा जल्दी चलना या रेंगना सीखता है?
मालिश का बच्चे के विकास के पड़ावों जैसे बैठना, रेंगना या चलना सीखने से सीधा संबंध नहीं है। ये चीजें मुख्य रूप से जेनेटिक्स और बच्चे को मिलने वाले अवसरों पर निर्भर करती हैं। अगर बच्चे को पर्याप्त मूवमेंट का मौका नहीं मिलता, तो उसका विकास धीमा हो सकता है।

क्या मालिश से वजन बढ़ता है या पैर सीधे होते हैं?
डॉ. माधवी के अनुसार, बच्चे का वजन उसके आनुवंशिक गुणों पर निर्भर करता है, न कि मालिश पर। जन्म के समय बच्चों के पैर हल्के मुड़े हुए होते हैं, जो समय के साथ खुद ही सीधे हो जाते हैं। इसमें मालिश की कोई भूमिका नहीं होती।

तो क्या मालिश जरूरी नहीं है?
मालिश को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी सही नहीं है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे माता-पिता और बच्चे के बीच जुड़ाव मजबूत होता है। साथ ही बच्चा रिलैक्स महसूस करता है, उसकी त्वचा स्वस्थ रहती है और वह धीरे-धीरे अपने शरीर को मूव करना भी सीखता है।

अंत में यह समझना जरूरी है कि मालिश को चमत्कारिक उपाय की तरह न देखें। यह बच्चे की देखभाल का एक हिस्सा है, लेकिन उसका संपूर्ण विकास प्राकृतिक प्रक्रियाओं और सही माहौल पर ही निर्भर करता है।

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क्या आपका बच्चा भी लेता है खर्राटे? तो ना करें नजरअंदाज, हो सकता है किसी बीमारी का संकेत https://jantaexpress24x7.com/2026/02/25/does-your-child-snore-too-dont-ignore-it-it-could-be-a-sign-of-some-illness/ Wed, 25 Feb 2026 07:39:19 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6764

अक्सर माता-पिता बच्चों के खर्राटों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकेत हो सकता है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. माधवी भारद्वाज ने हाल ही में इस विषय पर जागरूकता बढ़ाते हुए बताया कि बच्चों में खर्राटे लेना कई बार अंदरूनी समस्या की ओर इशारा करता है, जिसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।

उन्होंने बताया कि कई अभिभावक इसे वंशानुगत मानकर टाल देते हैं, लेकिन यह सोच गलत हो सकती है। उदाहरण के तौर पर एक ऐसे बच्चे का जिक्र किया गया, जिसका वजन उम्र के हिसाब से अधिक था और वह नियमित रूप से खर्राटे लेता था, फिर भी परिवार उसे पूरी तरह स्वस्थ मान रहा था। डॉक्टर के अनुसार मोटापा और खर्राटों के बीच सीधा संबंध हो सकता है।

खर्राटों का वैज्ञानिक कारण समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब नाक से फेफड़ों तक जाने वाले वायु मार्ग में किसी तरह की रुकावट आती है, तो हवा के टकराने से आवाज पैदा होती है, जिसे खर्राटा कहा जाता है। सामान्य सर्दी-जुकाम में कुछ समय तक ऐसा होना आम है, लेकिन अगर बच्चा ठीक होने के बाद भी लगातार खर्राटे ले रहा है, तो यह टॉन्सिल्स या श्वसन मार्ग में सूजन या वृद्धि का संकेत हो सकता है।

इस समस्या का असर बच्चे की नींद और दिनचर्या पर भी पड़ता है। ऐसे बच्चे अक्सर ठीक से सो नहीं पाते, जिससे वे दिनभर थके हुए, चिड़चिड़े और ध्यान केंद्रित करने में कमजोर हो जाते हैं। पढ़ाई और खेल-कूद दोनों पर इसका नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।

डॉक्टर के अनुसार बच्चों में खर्राटों के प्रमुख कारणों में एलर्जी, एडिनोइड्स और टॉन्सिल्स की समस्या शामिल हैं। इसके अलावा बढ़ता वजन भी श्वसन मार्ग पर दबाव डालता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है और खर्राटे बढ़ जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते सही जांच और इलाज से इस समस्या को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे के लक्षणों को नजरअंदाज न करें और डॉक्टर से परामर्श लेकर उचित उपचार कराएं, ताकि बच्चे की नींद, स्वास्थ्य और विकास बेहतर हो सके।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल जानकारियों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार किया गया है।

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क्या तेजी से वजन घटना कैंसर का संकेत हो सकता है? आइये जानते हैं क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ https://jantaexpress24x7.com/2026/02/23/could-rapid-weight-loss-be-a-sign-of-cancer-lets-find-out-what-health-experts-say/ Mon, 23 Feb 2026 10:14:30 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6717

कैंसर आज के समय की सबसे तेजी से बढ़ती गंभीर बीमारियों में शामिल हो चुका है। दुनिया भर में यह न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है, बल्कि हर साल लाखों लोगों की जान भी ले रहा है। बदलती जीवनशैली, असंतुलित खान-पान, बढ़ता प्रदूषण और रसायनों के संपर्क ने इस खतरे को और अधिक बढ़ा दिया है। भारत में भी कैंसर के मामलों में लगातार इजाफा देखा जा रहा है, जिसे लेकर विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं।

हालिया रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई है कि आने वाले वर्षों में कैंसर के मामलों में और तेज वृद्धि हो सकती है। अनुमान है कि साल 2040 तक स्थिति और गंभीर हो सकती है, जहां बहुत कम अंतराल में नए मरीज सामने आएंगे। ऐसे में समय रहते इसके संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी हो जाता है। बिना किसी स्पष्ट कारण के तेजी से वजन घटना भी कई बार एक गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर सकता है।

कैंसर किन कारणों से होता है?

विशेषज्ञों के मुताबिक कैंसर की शुरुआत शरीर की कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव (म्यूटेशन) से होती है। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं—

तंबाकू और धूम्रपान का सेवन

वायु प्रदूषण और रेडिएशन

अस्वस्थ खान-पान और मोटापा

आनुवंशिक कारण

एचपीवी और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमण

भारत में बड़ी संख्या में कैंसर के मामले तंबाकू सेवन से जुड़े पाए गए हैं, जो इसे सबसे बड़ा जोखिम कारक बनाता है।

बिना कारण वजन घटना क्यों हो सकता है खतरनाक?

अचानक और तेजी से वजन कम होना हमेशा सामान्य नहीं होता। कई बार यह शरीर में चल रही गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है। कैंसर के मामलों में यह लक्षण अक्सर देखने को मिलता है, हालांकि हर बार इसका मतलब कैंसर ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है।

कैंसर में वजन क्यों घटता है?

कैंसर के दौरान शरीर के अंदर कई जैविक बदलाव होते हैं, जिनकी वजह से वजन तेजी से कम होने लगता है—

कैंसर कोशिकाएं शरीर की ऊर्जा और पोषण का ज्यादा उपयोग करती हैं

मेटाबॉलिज्म प्रभावित होने से भूख कम हो जाती है

शरीर ऊर्जा के लिए मांसपेशियों और फैट को तोड़ने लगता है

इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया से सूजन बढ़ती है, जिससे खाने की इच्छा कम होती है

कुछ मामलों में इंसुलिन रेजिस्टेंस भी विकसित हो जाता है

इसके अलावा इलाज के दौरान कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के कारण मतली, उल्टी और स्वाद में बदलाव जैसे दुष्प्रभाव भी वजन घटने का कारण बनते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बड़ी संख्या में कैंसर मरीजों में वजन कम होने की समस्या देखी जाती है, जो शरीर की कमजोरी और रिकवरी पर भी असर डालती है। इसलिए इसे एक महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत माना जाता है।

कैंसर से बचाव के उपाय

कैंसर से बचने के लिए जीवनशैली में सुधार सबसे प्रभावी तरीका है—

तंबाकू और धूम्रपान से पूरी तरह दूरी

संतुलित और पौष्टिक आहार का सेवन

नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण

शराब का सीमित या शून्य सेवन

प्रदूषण और हानिकारक रसायनों से बचाव

समय-समय पर हेल्थ चेकअप और स्क्रीनिंग

समय पर पहचान और सही जीवनशैली अपनाकर कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी लक्षण की स्थिति में डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।

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बदलते मौसम का असर- सर्दी-खांसी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी, जानिए खुद को कैसे रखें सुरक्षित https://jantaexpress24x7.com/2026/02/20/the-changing-weather-has-impacted-the-number-of-cold-and-cough-cases-so-learn-how-to-stay-safe/ Fri, 20 Feb 2026 07:45:31 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6652

मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव के साथ वायरल संक्रमण के मामलों में अचानक बढ़ोतरी देखी जा रही है। दिन में बढ़ती गर्मी और सुबह-शाम की हल्की ठंड शरीर पर असर डाल रही है, जिससे लोग सर्दी, खांसी और बुखार जैसी समस्याओं की चपेट में आ रहे हैं। अस्पतालों और क्लीनिकों में गले में खराश, नाक बंद, छींक और हल्के बुखार की शिकायत लेकर पहुंचने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, तापमान में उतार-चढ़ाव शरीर के लिए एक तरह का दबाव (थर्मल स्ट्रेस) पैदा करता है। ऐसे में शरीर को नए मौसम के अनुसार खुद को ढालने में समय लगता है, जिससे इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ सकता है। यही स्थिति वायरस को संक्रमण फैलाने का मौका देती है। इसी वजह से मौसम बदलते ही फ्लू, वायरल फीवर और सर्दी-खांसी के मामले तेजी से बढ़ने लगते हैं।

जनरल फिजिशियन डॉ अरविंद शर्मा के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में ओपीडी में वायरल संक्रमण के मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। मरीजों में तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, गले में खराश, खांसी और कमजोरी जैसे लक्षण सामान्य रूप से देखे जा रहे हैं। कई लोगों में स्वाद और गंध की क्षमता अस्थायी रूप से प्रभावित हो रही है, हालांकि ज्यादातर मामलों में यह कुछ दिनों में ठीक हो जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक मौसम परिवर्तन वायरस के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। इसके अलावा भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर जाना, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना और स्वच्छता में कमी संक्रमण के खतरे को बढ़ा देती है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों को इस समय विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।

वायरल फीवर मुख्य रूप से इन्फ्लूएंजा जैसे वायरस के कारण फैलता है, जो खांसने-छींकने से निकलने वाली बूंदों या संक्रमित सतहों के संपर्क से तेजी से फैल सकता है। बदलते मौसम में यह संक्रमण ज्यादा सक्रिय हो जाता है।

बचाव के लिए डॉक्टर संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम पर जोर देते हैं। हाथों की सफाई बनाए रखना, भीड़-भाड़ में मास्क पहनना और बीमार लोगों से दूरी रखना भी जरूरी है। अगर बुखार तीन दिन से ज्यादा बना रहे, सांस लेने में दिक्कत हो या अत्यधिक कमजोरी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि थोड़ी सावधानी और मजबूत इम्युनिटी के जरिए इस मौसमी वायरल संक्रमण से काफी हद तक बचा जा सकता है।

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बच्चों की मजबूत इम्युनिटी के लिए डाइट में शामिल करें ये चीजें, बीमारियाँ रहेंगी दूर https://jantaexpress24x7.com/2026/02/19/include-these-things-in-your-childs-diet-for-strong-immunity-and-keep-diseases-at-bay/ Thu, 19 Feb 2026 09:36:51 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6628

बदलते मौसम और बढ़ते संक्रमण के दौर में बच्चों की सेहत को लेकर चिंता स्वाभाविक है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की मजबूत इम्युनिटी की नींव दवाओं से नहीं, बल्कि सही खानपान और दिनचर्या से रखी जाती है। अगर बचपन से ही पौष्टिक आहार की आदत डाली जाए, तो बच्चे न सिर्फ बीमारियों से दूर रहते हैं बल्कि उनका संपूर्ण विकास भी बेहतर होता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों का इम्यून सिस्टम काफी नाजुक होता है, इसलिए उन्हें रोजाना ऐसे पोषक तत्वों की जरूरत होती है जो शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाएं। विटामिन, मिनरल्स और एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर आहार बच्चों को अंदर से मजबूत बनाता है और संक्रमण के खतरे को कम करता है।

खट्टे फल बनाएं प्राकृतिक सुरक्षा कवच

संतरा, नींबू और आंवला जैसे खट्टे फल विटामिन-C से भरपूर होते हैं, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं। ये फल सफेद रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करते हैं, जिससे शरीर संक्रमण से बेहतर तरीके से लड़ पाता है। बच्चों को रोजाना ताजे फल या जूस देना बेहद फायदेमंद होता है।

बादाम और अखरोट

बादाम और अखरोट जैसे ड्राई फ्रूट्स बच्चों के लिए ऊर्जा और पोषण का अच्छा स्रोत हैं। इनमें मौजूद विटामिन-E और ओमेगा-3 फैटी एसिड शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं। रोज सुबह भीगे हुए बादाम खिलाने से बच्चों की याददाश्त और शारीरिक विकास दोनों में सुधार होता है।

दही से दुरुस्त रहे पाचन तंत्र

विशेषज्ञ बताते हैं कि शरीर की इम्युनिटी का बड़ा हिस्सा पाचन तंत्र से जुड़ा होता है। दही में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया (प्रोबायोटिक्स) पेट को स्वस्थ रखते हैं और हानिकारक कीटाणुओं को पनपने से रोकते हैं। बच्चों के भोजन में दही या फ्रूट योगर्ट शामिल करना लाभकारी साबित होता है।

हल्दी वाला दूध और स्वस्थ दिनचर्या जरूरी

हल्दी को प्राकृतिक औषधि माना जाता है, जो शरीर की सूजन को कम करने और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करती है। रात में हल्दी वाला दूध देने से बच्चों की नींद बेहतर होती है। इसके साथ ही रोजाना खेल-कूद और पर्याप्त नींद भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि स्वस्थ दिनचर्या ही मजबूत इम्युनिटी की असली कुंजी है।

निष्कर्ष: बच्चों की सेहत को मजबूत बनाए रखने के लिए महंगे सप्लीमेंट्स नहीं, बल्कि संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या और अच्छी आदतें ही सबसे प्रभावी उपाय हैं। सही पोषण ही बच्चों को बीमारियों से बचाने का सबसे मजबूत आधार है।

नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

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सेहत का खजाना है अंजीर, रोजाना सेवन करने से मिलते हैं कई बड़े फायदे https://jantaexpress24x7.com/2026/02/18/figs-are-a-treasure-of-health-consuming-them-daily-provides-many-great-benefits/ Wed, 18 Feb 2026 08:31:11 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6595

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में संतुलित आहार सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर डाइट में पोषक तत्वों से भरपूर चीज़ों को शामिल किया जाए, तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है। ऐसे में ड्राई फ्रूट्स में शामिल अंजीर को सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है।

मीठे स्वाद वाला अंजीर न सिर्फ स्वाद बढ़ाता है, बल्कि इसमें मौजूद पोषक तत्व इसे एक संपूर्ण हेल्दी फूड बनाते हैं। सूखे और ताजे दोनों रूपों में खाया जाने वाला अंजीर फाइबर, कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है, जो शरीर को कई स्तरों पर लाभ पहुंचाता है।

डाइट में अंजीर क्यों है जरूरी?

पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, अंजीर में मौजूद फाइटोन्यूट्रिएंट्स और पॉलीफेनॉल्स शरीर में सूजन को कम करने और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। सीमित मात्रा में इसका रोज़ाना सेवन करने से शरीर को जरूरी माइक्रो और मैक्रो न्यूट्रिएंट्स मिलते हैं, जिससे ओवरऑल हेल्थ बेहतर रहती है।

अंजीर में घुलनशील और अघुलनशील दोनों प्रकार का फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में सहायक है। इसके नियमित सेवन से कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। साथ ही इसमें मौजूद पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।

अंजीर का पानी भी है लाभकारी

आयुर्वेद में अंजीर को विशेष महत्व दिया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, रातभर अंजीर को पानी में भिगोकर सुबह उसका सेवन करने से इसके पोषक तत्व बेहतर तरीके से शरीर में अवशोषित होते हैं। अंजीर का पानी मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, आंतों की सफाई में मदद करता है और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है।

अंजीर के पानी में मौजूद लैक्सेटिव गुण सुबह पेट साफ करने में सहायक होते हैं। इसके नियमित सेवन से भूख नियंत्रित रहती है, जिससे ओवरईटिंग से बचाव होता है और वजन घटाने में भी मदद मिलती है। इसके अलावा इसमें मौजूद आयरन हीमोग्लोबिन बढ़ाने में सहायक है, जिससे थकान और कमजोरी दूर होती है। महिलाओं में हार्मोनल संतुलन बनाए रखने और हड्डियों को मजबूत करने में भी यह पानी फायदेमंद माना जाता है।

अंजीर खाने के अन्य फायदे

अंजीर कैल्शियम, फॉस्फोरस और मैग्नीशियम का अच्छा स्रोत है, जो हड्डियों को मजबूत बनाता है और ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को कम करता है। इसमें मौजूद विटामिन्स और एंटीऑक्सीडेंट्स इम्युनिटी को मजबूत करने के साथ-साथ त्वचा को भी स्वस्थ बनाए रखते हैं। हृदय स्वास्थ्य के लिहाज़ से भी अंजीर को लाभकारी माना जाता है।

डायबिटीज में अंजीर कितना सुरक्षित?

अंजीर मीठा होने के कारण डायबिटीज मरीजों के मन में इसे लेकर सवाल रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सीमित मात्रा में सेवन करने पर इसमें मौजूद फाइबर ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ने में मदद करता है, जिससे अचानक शुगर बढ़ने का खतरा कम होता है। हालांकि अधिक मात्रा में सेवन नुकसानदायक हो सकता है।

पोषण विशेषज्ञ नेहा पठानिया के अनुसार, डायबिटीज, लो ब्लड प्रेशर, किडनी स्टोन, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या लेटेक्स एलर्जी से पीड़ित लोगों को अंजीर या इसके पानी का सेवन चिकित्सकीय सलाह के बाद ही करना चाहिए।

नोट: यह लेख डॉक्टरों की सलाह और विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स पर आधारित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

(साभार)

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गलत खानपान और मानसिक तनाव बन रहे हाई ब्लड प्रेशर की बड़ी वजह, समय रहते हो जाएं सावधान https://jantaexpress24x7.com/2026/02/17/wrong-eating-habits-and-mental-stress-are-becoming-the-major-causes-of-high-blood-pressure-be-careful-in-time/ Tue, 17 Feb 2026 11:44:14 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6573

तेज रफ्तार जिंदगी, बढ़ता तनाव और बिगड़ी दिनचर्या आज लोगों को कई गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रही है। इन्हीं में से एक है हाई ब्लड प्रेशर, जो बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के शरीर को अंदर ही अंदर नुकसान पहुंचाता रहता है। अधिकांश लोग इसे सामान्य थकान या रोजमर्रा का तनाव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर जानलेवा साबित हो सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर केवल उम्र बढ़ने की बीमारी नहीं है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की आदतों का नतीजा है। गलत खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक तनाव धीरे-धीरे रक्तचाप को असंतुलित कर देते हैं। लंबे समय तक बढ़ा हुआ बीपी हृदय, मस्तिष्क और किडनी जैसे अहम अंगों पर गंभीर असर डालता है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

शुरुआत में नहीं दिखते लक्षण, इसलिए बढ़ता है जोखिम

हाई ब्लड प्रेशर की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके लक्षण शुरुआती दौर में बेहद सामान्य होते हैं या कई बार दिखाई ही नहीं देते। इसी वजह से इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है। समय रहते अगर जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो यह समस्या जीवनभर साथ चलने वाली बीमारी बन सकती है।

ज्यादा नमक और जंक फूड बन रहे दुश्मन

विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक नमक का सेवन बीपी बढ़ने की सबसे बड़ी वजहों में से एक है। सोडियम की ज्यादा मात्रा शरीर में पानी को रोकती है, जिससे रक्त की मात्रा बढ़ जाती है और धमनियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। जंक फूड, पैकेट वाले स्नैक्स और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में नमक छिपे रूप में बहुत ज्यादा होता है। डॉक्टरों की सलाह है कि रोजाना नमक की मात्रा सीमित रखनी चाहिए।

शारीरिक गतिविधि की कमी से बिगड़ता संतुलन

आज की व्यस्त जीवनशैली में घंटों बैठकर काम करना आम हो गया है। शारीरिक गतिविधि की कमी से वजन तेजी से बढ़ता है और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। खासतौर पर पेट के आसपास जमा चर्बी हाई बीपी को बढ़ावा देती है। रोजाना हल्की एक्सरसाइज, तेज चाल से चलना या योग करने से रक्त प्रवाह बेहतर होता है और ब्लड प्रेशर नियंत्रण में रहता है।

तनाव और नींद की कमी भी बड़ा कारण

लगातार तनाव में रहना और पूरी नींद न लेना भी हाई ब्लड प्रेशर को बढ़ाता है। तनाव के कारण शरीर में ऐसे हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं जो दिल की धड़कन और रक्तचाप को तेज कर देते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि 7 से 8 घंटे की गहरी नींद और ध्यान-प्राणायाम जैसे उपाय तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।

नियमित जांच और सतर्कता ही बचाव का रास्ता

हाई ब्लड प्रेशर से बचने का सबसे कारगर तरीका है समय पर जांच और अनुशासित जीवनशैली। नियमित रूप से बीपी चेक कराना, संतुलित आहार लेना और नशे से दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी है। पोटेशियम से भरपूर फल और हरी सब्जियां ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज बरती गई थोड़ी सी सावधानी भविष्य की बड़ी स्वास्थ्य समस्या से बचा सकती है।

नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है।

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इयरफोन की लत बना सकती है आपको बहरा, समय रहते हो जायें सावधान https://jantaexpress24x7.com/2026/02/16/earphone-addiction-can-make-you-deaf-be-careful-in-time/ Mon, 16 Feb 2026 08:23:28 +0000 https://jantaexpress24x7.com/?p=6535

आज के स्मार्टफोन और डिजिटल गैजेट्स के दौर में इयरफोन और हेडफोन हमारी रोजमर्रा की जरूरत बन चुके हैं। कामकाज, पढ़ाई, मनोरंजन या सफर—हर जगह इनका इस्तेमाल आम हो गया है। लेकिन जिस सुविधा ने जीवन को आसान बनाया है, वही आदत अगर लापरवाही से अपनाई जाए तो सुनने की क्षमता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

तेज आवाज से बढ़ता बहरापन का खतरा

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक तेज आवाज में इयरफोन या हेडफोन लगाने से कान के अंदर मौजूद बेहद संवेदनशील कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। खासतौर पर 85 डेसिबल से अधिक की आवाज को लगातार सुनना सुनने की शक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करता है। इस स्थिति को ‘नॉइज-इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस’ कहा जाता है, जो अक्सर स्थायी होती है।

धीरे-धीरे उभरते हैं लक्षण

बहरापन किसी एक दिन में नहीं होता। शुरुआत में कान में भारीपन, सीटी जैसी आवाज, या बातचीत के दौरान शब्द साफ न सुनाई देना जैसे संकेत दिखते हैं। अगर इन चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया, तो कम उम्र में ही गंभीर श्रवण समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

इयरफोन से कानों को कैसे पहुंचता है नुकसान

इयरबड्स सीधे कान की नली में फिट होते हैं, जिससे ध्वनि और कान के पर्दे के बीच कोई दूरी नहीं रहती। तेज आवाज का सीधा दबाव अंदर मौजूद तरल और नसों को प्रभावित करता है। लगातार ऐसा होने पर सुनने वाली नसें कमजोर हो जाती हैं और सामान्य आवाजें भी अस्पष्ट लगने लगती हैं।

कानों की सुरक्षा का आसान उपाय: 60/60 नियम

विशेषज्ञों की सलाह है कि हेडफोन या इयरफोन का इस्तेमाल करते समय ‘60/60 नियम’ अपनाना चाहिए। यानी, वॉल्यूम को अधिकतम 60 प्रतिशत से ऊपर न रखें और लगातार 60 मिनट से ज्यादा इस्तेमाल न करें। हर घंटे के बाद 10–15 मिनट का ब्रेक देना कानों के लिए जरूरी है, ताकि वे खुद को रिकवर कर सकें।

इयरफोन या हेडफोन—कौन सा बेहतर?

स्वास्थ्य के लिहाज से ओवर-द-इयर हेडफोन को इयरबड्स से थोड़ा सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि वे कान के पर्दे से कुछ दूरी पर रहते हैं और बाहरी शोर को भी कम करते हैं। इससे तेज वॉल्यूम की जरूरत कम पड़ती है। हालांकि, गलत इस्तेमाल दोनों ही मामलों में नुकसानदायक हो सकता है।

इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

अगर कान में दर्द, झनझनाहट, बार-बार आवाज समझने में परेशानी या बातचीत के दौरान शब्द गुम हो जाने जैसी दिक्कत महसूस हो, तो तुरंत इयरफोन का इस्तेमाल कम करें और विशेषज्ञ से सलाह लें। याद रखें, सुनने की शक्ति एक बार चली जाए तो उसे वापस पाना बेहद मुश्किल होता है।

निष्कर्ष:
डिजिटल दुनिया में रहते हुए तकनीक से दूरी बनाना मुश्किल है, लेकिन थोड़ी सावधानी और सही आदतें अपनाकर हम अपनी सुनने की अनमोल शक्ति को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं।

(यह लेख सामान्य मेडिकल जानकारियों और विशेषज्ञ सलाह पर आधारित है।)

(साभार)

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