उत्तराखण्ड पुलिस में संदिग्ध अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्रों के आधार पर हुई नियुक्तियों की हो उच्चस्तरीय जांच
बेरोजगार युवा सड़कों पर, अपात्र व्यक्ति आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी सेवा में कैसे कार्यरत?
देहरादून। अधिवक्ता एवं सामाजिक/आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने गृह सचिव, उत्तराखण्ड शासन, पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड तथा अपर पुलिस अधीक्षक कार्मिक, पुलिस मुख्यालय को विस्तृत शिकायत भेजकर उत्तराखण्ड पुलिस सेवा एवं पुलिस विभाग में अनुसूचित जनजाति आरक्षण के आधार पर नियुक्त और पदोन्नत अधिकारियों एवं कर्मचारियों के जाति प्रमाण-पत्रों की स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा समयबद्ध उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
शिकायत में कहा गया है कि उत्तराखण्ड में हजारों शिक्षित बेरोजगार युवा सरकारी नौकरी के लिए वर्षों से भटक रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और सीमित पदों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में यदि किसी अपात्र व्यक्ति ने गलत, संदिग्ध, त्रुटिपूर्ण अथवा राष्ट्रपति आदेश के बाहर की जाति या उपजाति के प्रमाण-पत्र के आधार पर आरक्षित पद पर नियुक्ति या पदोन्नति प्राप्त की है, तो यह वास्तविक अनुसूचित जनजाति अभ्यर्थियों तथा प्रदेश के बेरोजगार युवाओं के संवैधानिक अधिकारों पर गंभीर आघात है।

नेगी ने कहा कि यह विषय किसी व्यक्ति की निजी जातिगत पहचान जानने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक नियुक्तियों की वैधानिकता, आरक्षण व्यवस्था की शुचिता और सरकारी धन की सुरक्षा का है। आरक्षित श्रेणी का लाभ लेकर सार्वजनिक पद प्राप्त करने वाले अधिकारी के प्रमाण-पत्र का सक्षम प्राधिकारी, निर्गमन तिथि, मूल अभिलेख, सत्यापन और वैधानिक स्थिति पूर्णतः निजी विषय नहीं माने जा सकते।
उन्होंने बताया कि दिनांक 13 जून 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत उत्तराखण्ड पुलिस सेवा में अनुसूचित जनजाति श्रेणी से नियुक्त अधिकारियों और उनके प्रमाण-पत्रों के सत्यापन से संबंधित सूचना मांगी गई थी। गृह अनुभाग–1 ने पत्र संख्या 69/XX-1-2026-6(09)/2026, दिनांक 24 जुलाई 2026 के माध्यम से संबंधित अधिकारियों की असहमति के आधार पर सूचना को व्यक्तिगत बताते हुए उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया।
प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि जिस अधिकारी के प्रमाण-पत्र की वैधानिकता जांच का विषय हो, उसी अधिकारी की सहमति या असहमति को निर्णायक आधार बनाना निष्पक्ष प्रशासन के सिद्धांतों के विपरीत है। संबंधित अधिकारी द्वारा सूचना देने से असहमति जताने के बावजूद विभाग प्रमाण-पत्र का मूल तहसील अभिलेखों, जिलाधिकारी कार्यालय, प्रमाण-पत्र जारी करने वाली पत्रावली और सक्षम जाति प्रमाण-पत्र छानबीन समिति से सत्यापन कराने के लिए बाध्य है।
विकेश सिंह नेगी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों की सूची राष्ट्रपति द्वारा जारी संवैधानिक आदेश से निर्धारित होती है। इस सूची में किसी जाति, उपजाति, समूह अथवा समानार्थी समुदाय को जोड़ने या हटाने का अधिकार केवल संसद को है। किसी राज्य सरकार, न्यायालय, अधिकरण, आयोग, समिति अथवा प्रशासनिक अधिकारी को राष्ट्रपति आदेश की सूची का विस्तार करने का अधिकार नहीं है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने State of Maharashtra v. Milind, निर्णय दिनांक 28 नवंबर 2000, में प्रतिपादित किया था कि अनुसूचित जनजाति आदेश को उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए, जिस रूप में वह अधिसूचित है। आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लिखित न होने वाली किसी जाति, उपजाति अथवा समुदाय को साक्ष्य, स्थानीय प्रचलन अथवा समानार्थी नाम के आधार पर अनुसूचित जनजाति घोषित नहीं किया जा सकता।
अतः 28 नवंबर 2000 के बाद की सभी नियुक्तियां स्वतः अवैध नहीं कही जा सकतीं, लेकिन इस निर्णय के बाद भी यदि राष्ट्रपति आदेश में वर्णित जनजाति से भिन्न किसी जाति, उपजाति, स्थानीय नाम, पारिवारिक उपनाम या सामाजिक वर्ग के व्यक्ति को अनुसूचित जनजाति का प्रमाण-पत्र जारी कर नियुक्ति अथवा पदोन्नति का लाभ दिया गया है, तो ऐसे प्रत्येक मामले की जांच आवश्यक है। प्रमाण-पत्र अवैध पाए जाने पर नियुक्ति, पदोन्नति और उससे प्राप्त आर्थिक लाभों के संबंध में कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
शिकायत में मांग की गई है कि गृह विभाग, कार्मिक विभाग, समाज कल्याण विभाग, राजस्व विभाग तथा पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों की एक संयुक्त उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए। जांच ऐसे अधिकारी को न सौंपी जाए, जो स्वयं संबंधित नियुक्ति, पदोन्नति अथवा प्रमाण-पत्र सत्यापन प्रक्रिया से जुड़ा रहा हो।
प्रत्येक प्रमाण-पत्र के संबंध में निम्न बिंदुओं की जांच कराई जाए—
प्रमाण-पत्र किस अधिकारी, तहसील और जिले द्वारा जारी किया गया; जारी करने वाला अधिकारी विधिक रूप से सक्षम था या नहीं; प्रमाण-पत्र में लिखी जाति अथवा जनजाति का नाम राष्ट्रपति आदेश से अक्षरशः मेल खाता है या नहीं; मूल तहसील अभिलेखों में संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार की प्रविष्टियां उपलब्ध हैं या नहीं; तथा नियुक्ति के समय पुलिस विभाग ने प्रमाण-पत्र का वास्तविक सत्यापन कराया था या केवल प्रमाण-पत्र की प्रति सेवा पुस्तिका में रखकर औपचारिकता पूरी कर दी थी।
शिकायत में यह भी मांग की गई है कि जांच पूर्ण होने तक संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति पत्रावली, सेवा पुस्तिका, मूल जाति प्रमाण-पत्र, सत्यापन रिपोर्ट, पदोन्नति अभिलेख तथा डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं, जिससे किसी भी अभिलेख में परिवर्तन, प्रतिस्थापन अथवा छेड़छाड़ न की जा सके।
प्रथम दृष्टया संदिग्ध पाए जाने वाले मामलों को सक्षम जाति प्रमाण-पत्र छानबीन समिति के समक्ष भेजा जाए और संबंधित अधिकारी को सुनवाई का पूरा अवसर देते हुए विधिसम्मत निर्णय कराया जाए। प्रमाण-पत्र जाली, गलत, असत्य, भ्रामक अथवा अधिकार-क्षेत्र से बाहर जारी पाया जाता है तो लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्ति के साथ-साथ प्रमाण-पत्र जारी करने और सत्यापन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी निर्धारित की जाए।
विकेश सिंह नेगी ने कहा—
“उत्तराखण्ड का बेरोजगार युवा वर्षों तक परीक्षाओं और भर्तियों की प्रतीक्षा करता रहे और दूसरी ओर यदि कोई अपात्र व्यक्ति गैरकानूनी प्रमाण-पत्र के आधार पर आरक्षित पद पर नौकरी करता रहे, तो यह संविधान, बेरोजगार युवाओं और वास्तविक अनुसूचित जनजाति अभ्यर्थियों—तीनों के साथ अन्याय है। सरकार को अधिकारियों की असहमति के पीछे प्रकरण छिपाने के बजाय प्रत्येक संदिग्ध प्रमाण-पत्र की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह शिकायत किसी समुदाय अथवा वास्तविक अनुसूचित जनजाति के पात्र व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं है। इसका उद्देश्य वास्तविक पात्र व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना, आरक्षण व्यवस्था का दुरुपयोग रोकना तथा सार्वजनिक नियुक्तियों में पारदर्शिता और वैधानिकता सुनिश्चित करना है।
प्रमुख मांगें
उत्तराखण्ड पुलिस में अनुसूचित जनजाति आरक्षण के आधार पर हुई सभी संदिग्ध नियुक्तियों और पदोन्नतियों की उच्चस्तरीय जांच।
प्रमाण-पत्रों का मूल तहसील और जिला अभिलेखों से स्वतंत्र सत्यापन।
राष्ट्रपति आदेश से भिन्न जाति, उपजाति अथवा स्थानीय नाम पर जारी प्रमाण-पत्रों की विशेष जांच।
जांच लंबित रहने तक सभी मूल और डिजिटल सेवा अभिलेखों को सुरक्षित रखना।
अवैध प्रमाण-पत्र पाए जाने पर नियुक्ति, पदोन्नति और आर्थिक लाभों के संबंध में विधिसम्मत कार्रवाई।
गलत प्रमाण-पत्र जारी करने और सत्यापन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना।
गृह अनुभाग–1 के दिनांक 24 जुलाई 2026 के पत्र का व्यापक लोकहित में पुनः परीक्षण।

